Language Selection

Get healthy now with MedBeds!
Click here to book your session

Protect your whole family with Orgo-Life® Quantum MedBed Energy Technology® devices.

Advertising by Adpathway

         

 Advertising by Adpathway

उत्तर और दक्षिण भारत की दो यात्राओं में क्या संबंध है

5 months ago 131

PROTECT YOUR DNA WITH QUANTUM TECHNOLOGY

Orgo-Life the new way to the future

  Advertising by Adpathway

मुंबई में, हिंदू पंचांग का महत्त्वपूर्ण श्रावण महीना गटारी अमावस्या के दिन शुरू होता है। लेकिन भारत के कई अन्य भागों में वह इससे पहले आने वाली गुरू पूर्णिमा के दिन शुरू होता है। इस दिन कई युवक (और कुछ युवतियां भी) अपने कंधों पर कांवड़ लटकाए हुए गंगा नदी के तट से अपने-अपने गांवों तक लंबी यात्रा पर निकलते हैं। एक लंबे डंडे और उसकी दोनों ओर लटकी टोकरियों को मिलकर कांवड़ कहते हैं। उत्तर भारत में त्यौहारों का मौसम भी इसी दिन से शुरू होता है।

इन युवकों का उद्देश्य गंगाजल को नंगे पांव ले जाकर उसे अमावस्या की रात अपने गांव में स्थित शिव-लिंग पर डालना होता है। यह आवश्यक होता है कि ये मटके इस लंबी यात्रा के दौरान धरती को न छुएं। इसलिए, युवक विश्राम करते समय कांवड़ को पेड़ों पर टांगें रखते हैं।

कहते हैं कि अमृत पाने के लिए देवों और असुरों ने क्षीरसागर का मंथन किया था। क्षीरसागर से अमृत के निकलने से पहले हलाहल नामक विष निकला। उस विष से देवों और असुरों को हानि पहुंच सकती थी। इसलिए, उन्होंने शिव से उस विष को पीने का अनुरोध किया। हलाहल पीने पर शिव के गले में जलन होने लगी। कांवड़ियां मानते हैं कि शिव-लिंग पर गंगाजल डालने से शिव के गले में हुई जलन कम होती है।

अगले सप्ताह गंगा के मैदानों में शुरू होने वाली यह कांवड़ यात्रा उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है। सैकड़ों युवक ‘बम बम भोले’ चिल्लाते हुए दृढ़ निश्चय से कांवड़ को कंधों पर उठाए हुए चलते हैं। बहुधा नारंगी-लाल ध्वजों और लटकनों से सुसज्जित कांवड़ों और उन्हें उठाए हुए कांवड़ियों को देखने के लिए लोग हज़ारों की संख्या में महामार्गों के किनारे इकट्ठा होते हैं। पिछले कुछ सालों में ये कांवड़ियां बदनाम भी हुए हैं, अपने उपद्रवी व्यवहार के कारण और चूॅंंकि हज़ारों की संख्या में चलते हुए वे वाहनों को अवरुद्ध करते हैं।

किसी विलक्षण ढंग से श्रावण महीने का नाम रामायण में श्रवण नामक युवक के नाम से मिलता-जुलता है। यह कोई संयोग की बात नहीं है। श्रवण कुमार ने भी कांवड़ धारण किया था। लेकिन गंगाजल के बजाय वह अपने माता-पिता को टोकरियों में बिठाकर तीर्थयात्रा पर ले जा रहा था। उस समय राजा दशरथ के हाथों वह अनजाने में मारा गया। श्रवण-कुमार हिंदू आख्यान शास्त्र का आदर्श पुत्र है। उसने अपने उत्तरदायित्व का बोझ उठाकर अपने माता-पिता की सेवा की। ऐसा करने में उसने अपनी निजी स्वतंत्रता को त्याग दिया।

उत्तर भारत से बहुत दूर तमिल नाडु में, बाल-देवता और शिव के पुत्र, मुरुगन अर्थात कार्तिकेय के पूजक भी कांवड़ समान कावडी‌ नामक डंडा अपने कंधों पर उठाकर चलते हैं। हालाँकि कावडी‌ मोर पंखों से सुसज्जित होती है, उससे मटके नहीं टंगे होते हैं।

कहते हैं कि एक दिन अपने पिता के साथ मतभेद के बाद कार्तिकेय क्रोधित होकर कैलाश पर्वत से दूर दक्षिण की ओर चला गया। यहाँ उसे अपना घर याद आता था। इसलिए, शिव और पार्वती ने उसे दो पहाड़ भेजें। हिडिंबा नामक राक्षस ये पहाड़ कांवड़/ कावडी पर टांगकर दक्षिण ले गया। उसे स्पष्ट आदेश दिया गया था कि मुरुगन तक पहुंचने तक वह उन पहाड़ों को नीचे न रखें।

रास्ते में पहाड़ इतने भारी हुए कि हिडिंबा उन्हें धरती पर रखने में विवश हुआ। उसने देखा कि एक पहाड़ पर एक बालक बैठा हुआ था, जिस कारण पहाड़ इतना भारी हुआ था। वह जान गया कि वह बालक स्वयं मुरुगन था। जिस स्थान पर पहाड़ नीचे रखें गए वहां अब पलनी का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है।

कांवड़ सांसारिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। पार्वती ने तपस्वी शिव को गृहस्थ बनने में विवश किया था। उनके पुत्र, मुरुगन, उत्तर भारत में कुंवारे हैं लेकिन दक्षिण भारत में विवाहित हैं। शिव और मुरुगन, दोनों की उपासना को कांवड़ के साथ जोड़ा जाता है। यह सांसारिक जीवन में भाग लेने में विवश किए जाने का प्रतीक है। हलाहल उस पीड़ा का संकेतक है जो किसी युवक को तब होती है जब वह सामाजिक उत्तरदायित्वों का बोझ उठाता है। विवाहित जीवन की चौखट पर खड़े युवकों के मन में यह अत्यंत व्यावहारिक संघर्ष चलता है। इस संघर्ष को कांवड़ यात्रा दर्शाती आ रही है।

Read Entire Article

         

        

Start the new Vibrations with a Medbed Franchise today!  

Protect your whole family with Quantum Orgo-Life® devices

  Advertising by Adpathway