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Orgo-Life the new way to the future Advertising by Adpathwayपिछले सप्ताह के लेख में हमने हिंदू धर्म में मंदिरों की उत्पत्ति के बारे में जाना। हमने जाना कैसे सिंधु घाटी सभ्यता में मंदिर बनाए जाने के कोई प्रमाण अभी तक नहीं मिलें हैं। फिर हमने मंदिरों की उत्पत्ति से संबंधित दो विचारधाराओं के बारे में जाना जो आज प्रचलित हैं। आख़िर में हमने जाना कैसे हिंदू धर्म में स्थायी मंदिर वैदिक काल के बहुत बाद, संभवतः यूनानी प्रभाव के कारण बनाए जाने लगें। आइए आज के लेख में यह चर्चा जारी रखते हैं।
यूनानियों के आने से पहले, सन 500 BCE तक भारत में एक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक बदलाव हुआ था। बौद्ध और जैन इन संन्यासी धर्मों ने वैदिक आर्यों के कर्मकाण्ड को अस्वीकार करते हुए व्यक्तिगत चिंतन, ध्यान और अनुशासन को अधिक महत्त्व दिया।
भारत में मूर्तिपूजा की शुरुआत में भी बौद्ध धर्म का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। बुद्ध के निधन और दहन के बाद, उनके अनुयायी उनके दांत, केश और अन्य अवशेष ले गए। उन दिनों अवशेषों को नदी में विसर्जित करने की प्रथा थी। लेकिन ये अवशेष मिट्टी के टीलों के नीचे गाड़कर छतरियों से ढक दिए गए। ये स्तूप कहलाए और लोग उनकी उपासना करने लगें। आज मंदिरों में देवता की प्रदक्षिणा की जाती है। यह प्रथा इन्हीं स्तूपों की प्रदक्षिणा से शुरू हुई।
समय के साथ, टीले और छतरी की जगह पत्थर की संरचना बनाई गई और उसपर विस्तृत नक्काशी की गई। संभवतः यह यूनानी प्रभाव के कारण हुआ। सांची में एक आलंकारिक स्तूप है जो बाड़े और प्रवेशद्वार से घिरा हुआ है। इनपर विभिन्न मिथकीय जीवों की नक्काशी पाई जाती है। आगे जाकर, बुद्ध के काल से लगभग 500 वर्ष बाद से शुरू होते हुए, यूनानियों के प्रभाव के कारण स्तूपों पर बुद्ध की प्रतिमा नक्काशी जाने लगी। फिर, स्तूपों के चारों ओर चैत्य बनाए गए। प्रारंभिक मंदिर इसी परिबद्ध संरचना पर आधारित हैं।
326 BCE में सिकंदर के भारत पर आक्रमण के बाद यूनानियों ने उत्तर-पूर्व भारत में विभिन्न राज्य स्थापित किए। इससे भारत यूनान, मिस्र, मेसोपोटामिया और फ़ारस के विचारों से परिचित हुआ। वहाँ पत्थर और ईंट के विशाल मंदिर, पिरामिड और महाविद्यालय होते थे। फलस्वरूप, भारत में पत्थर की प्रारंभिक प्रतिमाओं पर यूनान का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। यूनान की इमारतों में ओबिलिस्क नामक मुक्त खड़े स्तंभ होते थे। इससे प्रभावित होकर भारत के मंदिरों में ध्वज-स्तंभ बनाए गए, जो आज भी मंदिरों का एक महत्त्वपूर्ण भाग हैं। यूनान के मंदिरों में देवता आवरणों से ढके जाते थे। भारतीय मंदिरों में भी अनुष्ठानों के समय देवताओं को आवरणों से ढका जाता है। राजस्थान और गुजरात की हवेलियों में श्रीनाथजी के पीछे पिछवाई नामक आवरण टंगा जाता है। रोचक बात यह है कि रंगमंच पर आवरण को आज भी यवनिका कहा जाता है।
प्रारंभिक मंदिर गुफ़ाओं में बनाए गए। भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक मुंबई के पास एलीफ़न्टा गुफ़ाओं में है। हम निश्चिततः नहीं सकते हैं कि इन मंदिरों में पूजा की जाती थी। उनमें पाईं गईं पत्थर की मूर्तियाँ लकड़ी की मूर्तियों की प्रतिरूप हैं। स्पष्टतया पत्थर के मंदिर बनाने से पहले लकड़ी के मंदिर बनाए गए। ऐसे मंदिर नेपाल, केरल और हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में आज भी देखें जाते हैं। लेकिन समय के साथ स्वतंत्र, पत्थर के मंदिर बनाए जाने लगें, जैसे एल्लोरा का कैलाशनाथ मंदिर और चेन्नई के पास महाबलीपुरम का पंच-रथ मंदिर।
6ठीं और 16वीं सदियों के बीच भारतभर में पत्थर के मंदिरों के निर्माण ने कलात्मक रूप ले लिया। मंदिर की वास्तुकला और मूर्तियों दोनों में महत्त्वपूर्ण बदल दिखाई दिए। इस अवधि में अपरिष्कृत संरचनाओं की जगह ब्रह्मांडीय मानचित्र अर्थात मंडल के रूप में विस्तृत मंदिर बनाए गए। देवता की मूर्ति गर्भ-गृह में रखी गई। गर्भ-गृह के ऊपर शिखर और उसके सामने जगमोहन बनाया गया जहाँ श्रद्धालु इकट्ठा होते थे। गिरजाघर या मस्जिद में श्रद्धालु निराकार देवत्व को पूजते हैं। इसके विपरीत, मंदिर देवताओं का आलय बन गया। जैसे लोग राजा के सम्मान में राजदरबार जाते थे, वैसे श्रद्धालु देवता को पूजने मंदिर जाने लगें।
समय के साथ इन प्रतिमाओं ने प्रतीकात्मक अर्थ लेकर वे कम आलंकारिक और अधिक सजीव बनती गईं। खजुराहो, कोणार्क, चिदंबरम और मदुरै के मंदिरों में पाईं जाने वाली पत्थर की प्रतिमाओं का यही सजीव स्वरुप उनकी विशेषता है, जो आधुनिक काल की प्रतिकृतियों में नहीं पाया जाता।
दक्षिण भारत में, मंदिर को हमलों से सुरक्षित रखने के लिए उसके चारों ओर दीवारें बनाईं गईं। इन दीवारों में प्रवेशद्वार और उन प्रवेशद्वारों के ऊपर गोपुरम होते थे। इन अलंकृत गोपुरमों की अलग ही कलात्मक पहचान बन गई। दीवारों के भीतर अन्य देवताओं के मंदिर बनाए गए और इस प्रकार संपूर्ण मंदिर परिसर निर्माण हुआ। और जैसे बौद्ध धर्म में चैत्य के चारों ओर विहार नामक मठ होते थे, वैसे मंदिर परिसर ब्राह्मणों के घरों से घिरा होता था। श्रीरंगम और तिरुवनंतपुरम जैसे शहर इसी प्रकार विकसित होकर आज तक पनप रहें हैं।






















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